Sun. Nov 17th, 2019

Itihas Ke Panne

Mr. Pratapsinh Rajput (M.A. , PhD Pursing In History)

प्राचीन भारत का इतिहास

भारत का इतिहास और संस्कृ ति गतिशील है और यह मानव सभ्यपता की शुरूआत तक जाती है। यह सिंधु घाटी की रहस्यभमयी संस्कृंति से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है। भारत के इतिहास में भारत के आस पास स्थित अनेक संस्कृकतियों से लोगों का निरंतर समेकन होता रहा है। उपलब्धक साक्ष्य सुझाते हैं कि लोहे, तांबे और अन्यस धातुओं के उपयोग काफी शुरूआती समय में भी भारतीय उप महाद्वीप में प्रचलित थे, जो दुनिया के इस हिस्सेा द्वारा की गई प्रगति का संकेत है। चौंथी सहस्राब्दि बी. सी. के अंत तक भारत एक अत्यंेत विकसित सभ्यरता के क्षेत्र के रूप में उभर चुका था।

सिंधु घाटी की सभ्य ता

भारत का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यhता के जन्मa के साथ आरंभ हुआ, और अधिक बारीकी से कहा जाए तो हड़प्पा सभ्युता के समय इसकी शुरूआत मानी जाती है। यह दक्षिण एशिया के पश्चिमी हिस्सेत में लगभग 2500 बीसी में फली फूली, जिसे आज पाकिस्ताभन और पश्चिमी भारत कहा जाता है। सिंधु घाटी मिश्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार प्राचीन शहरी सबसे बड़ी सभ्य ताओं का घर थी। इस सभ्यमता के बारे में 1920 तक कुछ भी ज्ञात नहीं था, जब भारतीय पुरातात्विक विभाग ने सिंधु घाटी की खुदाई का कार्य आरंभ किया, जिसमें दो पुराने शहरों अर्थात मोहन जोदाड़ो और हड़प्पा के भग्नाईवशेष निकल कर आए। भवनों के टूटे हुए हिस्सेे और अन्यर वस्तु़एं जैसे कि घरेलू सामान, युद्ध के हथियार, सोने और चांदी के आभूषण, मुहर, खिलौने, बर्तन आदि दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में लगभग पांच हजार साल पहले एक अत्यं त उच्चट विकसित सभ्यनता फली फूली।

सिंधु घाटी की सभ्यीता मूलत: एक शहरी सभ्याता थी और यहां रहने वाले लोग एक सुयोजनाबद्ध और सुनिर्मित कस्बों में रहा करते थे, जो व्यापपार के केन्द्रt भी थे। मोहन जोदाड़ो और हड़प्पाw के भग्नाmवशे0ष दर्शाते हैं कि ये भव्य” व्या1पारिक शहर वैज्ञानिक दृष्टि से बनाए गए थे और इनकी देखभाल अच्छीa तरह की जाती थी। यहां चौड़ी सड़कें और एक सुविकसित निकास प्रणाली थी। घर पकाई गई ईंटों से बने होते थे और इनमें दो या दो से अधिक मंजिलें होती थी।

उच्च विकसित सभ्याता हड़प्पा में अनाज, गेहूं और जौ उगाने की कला ज्ञात थी, जिससे वे अपना मोटा भोजन तैयार करते थे। उन्हों।ने सब्जियों और फल तथा मांस, सुअर और अण्डे का सेवन भी किया। साक्ष्या सुझाव देते हैं कि ये ऊनी तथा सूती कपड़े पहनते थे। वर्ष 1500 से बी सी तक हड़प्पकन सभ्य।ता का अंत हो गया। सिंधु घाटी की सभ्याता के नष्ट हो जाने के प्रति प्रचलित अनेक कारणों में शामिल है, लगातार बाढ़ और अन्यट प्राकृतिक विपदाओं का आना जैसे कि भूकंप आदि।

वैदिक सभ्य ता

प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्यंता सबसे प्रारंभिक सभ्यlता है। इसका नामकरण हिन्दु;ओं के प्रारम्भिक साहित्यv वेदों के नाम पर किया गया है। वैदिक सभ्यlता सरस्वसती नदी के किनारे के क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा राज्यै आते हैं, में विकसित हुई। वैदिक हिन्दुेओं का पर्यायवाची है, यह वेदों से निकले धार्मिक और आध्याहत्मिक विचारों का दूसरा नाम है।

इस अवधि के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत थे।

बौद्ध युग

भगवान गौतम बुद्ध के जीवनकाल में, ईसा पूर्व 7 वीं और शुरूआती 6 वीं शताब्दि के दौरान सोलह बड़ी शक्तियां (महाजनपद) विद्यमान थे। अति महत्व पूर्ण गणराज्यों में कपिलवस्तुे के शाक्यश और वैशाली के लिच्छ)वी गणराज्य। थे। गणराज्योंग के अलावा राजतंत्रीय राज्यण भी थे, जिनमें से कौशाम्बीश (वत्सछ), मगध, कोशल, और अवन्ति महत्वगपूर्ण थे। इन राज्योंे का शासन ऐसे शक्तिशाली व्यरक्तियों के पास था, जिन्होंमने राज्य। विस्तारर और पड़ोसी राज्योंर को अपने में मिलाने की नीति अपना रखी थी। तथापि गणराज्या.त्म:क राज्योंs के तब भी स्प-ष्ट3 संकेत थे जब राजाओं के अधीन राज्यों का विस्तार हो रहा था।

बुद्ध का जन्म” ईसा पूर्व 560 में हुआ और उनका देहान्ता ईसा पूर्व 480 में 80 वर्ष की आयु में हुआ। उनका जन्मज स्थाईन नेपाल में हिमालय पर्वत श्रंखला के पलपा गिरि की तलहटी में बसे कपिलवस्तुn नगर का लुम्बिनी नामक निकुंज था। बुद्ध, जिनका वास्‍‍तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था, ने बुद्ध धर्म की स्थाकपना की जो पूर्वी एशिया के अधिकांश हिस्सोंा में एक महान संस्कृ ति के रूप में वि‍कसित हुआ।

सिकंदर का आक्रमण

ईसा पूर्व 326 में सिकंदर सिंधु नदी को पार करके तक्षशिला की ओर बढ़ा व भारत पर आक्रमण किया। तब उसने झेलम व चिनाब नदियों के मध्यक अवस्थ्ति राज्यद के राजा पौरस को चुनौती दी। यद्यपि भारतीयों ने हाथियों, जिन्हें मेसीडोनिया वासियों ने पहले कभी नहीं देखा था, को साथ लेकर युद्ध किया, परन्तुअ भयंकर युद्ध के बाद भारतीय हार गए। सिकंदर ने पौरस को गिरफ्तार कर लिया, तथा जैसे उसने अन्या स्थाननीय राजाओं को परास्त किया था, की भांति उसे अपने क्षेत्र पर राज्यो करने की अनुमति दे दी।

दक्षिण में हैडासयस व सिंधु नदियों की ओर अपनी यात्रा के दौरान, सिकंदर ने दार्शनिकों, ब्राह्मणों, जो कि अपनी बुद्धिमानी के लिए प्रसिद्ध थे, की तलाश की और उनसे दार्शनिक मुद्दों पर बहस की। वह अपनी बुद्धिमतापूर्ण चतुराई व निर्भय विजेता के रूप में सदियों तक भारत में किवदंती बना रहा।

उग्र भारतीय लड़ाके कबीलों में से एक मालियों के गांव में सिकन्दरर की सेना एकत्रित हुई। इस हमले में सिकन्दयर कई बार जख्मीे हुआ। जब एक तीर उसके सीने के कवच को पार करते हुए उसकी पसलियों में जा घुसा, तब वह बहुत गंभीर रूप से जख्मीन हुआ। मेसेडोनियन अधिकारियों ने उसे बड़ी मुश्किल से बचाकर गांव से निकाला।

सिकन्दंर व उसकी सेना जुलाई 325 ईसा पूर्व में सिंधु नदी के मुहाने पर पहुंची, तथा घर की ओर जाने के लिए पश्चिम की ओर मुड़ी।

मौर्य साम्राज्यर

मौर्य साम्राज्यp की अवधि (ईसा पूर्व 322 से ईसा पूर्व 185 तक) ने भारतीय इतिहास में एक युग का सूत्रपात किया। कहा जाता है कि यह वह अवधि थी जब कालक्रम स्पसष्ट हुआ। यह वह समय था जब, राजनीति, कला, और वाणिज्य् ने भारत को एक स्वुर्णिम ऊंचाई पर पहुंचा दिया। यह खंडों में विभाजित राज्योंक के एकीकरण का समय था। इससे भी आगे इस अवधि के दौरान बाहरी दुनिया के साथ प्रभावशाली ढंग से भारत के संपर्क स्थाथपित हुए।

सिकन्दरर की मृत्युर के बाद उत्पसन्नए भ्रम की स्थिति ने राज्योंा को यूनानियों की दासता से मुक्तड कराने और इस प्रकार पंजाब व सिंध प्रांतों पर कब्जाा करने का चन्द्र गुप्तय को अवसर प्रदान किया। उसने बाद में कौटिल्यं की सहायता से मगध में नन्दन के राज्यस को समाप्त कर दिया और ईसा पूर्व और 322 में प्रतापी मौर्य राज्यम की स्थानपना की। चन्द्र गुप्तत जिसने 324 से 301 ईसा पूर्व तक शासन किया, ने मुक्तिदाता की उपाधि प्रा‍प्ती की व भारत के पहले सम्रा‍ट की उपाधि प्राप्तऔ की।

वृद्धावस्थाo आने पर चन्द्र गुप्त1 की रुचि धर्म की ओर हुई तथा ईसा पूर्व 301 में उसने अपनी गद्दी अपने पुत्र बिंदुसार के लिए छोड़ दी। अपने 28 वर्ष के शासनकाल में बिंदुसार ने दक्षिण के ऊचांई वाले क्षेत्रों पर विजय प्राप्त़ की तथा 273 ईसा पूर्व में अपनी राजगद्दी अपने पुत्र अशोक को सौंप दी। अशोक न केवल मौर्य साम्राज्यप का अत्य8धिक प्रसिद्ध सम्राट हुआ, परन्तुु उसे भारत व विश्वन के महानतम सम्राटों में से एक माना जाता है।
उसका साम्राज्यं हिन्दुए कुश से बंगाल तक के पूर्वी भूभाग में फैला हुआ था व अफगानिस्ताअन, बलूचिस्तारन व पूरे भारत में फैला हुआ था, केवल सुदूर दक्षिण का कुछ क्षेत्र छूटा था। नेपाल की घाटी व कश्मी‍र भी उसके साम्राज्यह में शामिल थे।

अशोक के साम्राज्या की सबसे महत्वथपूर्ण घटना थी कलिंग विजय (आधुनिक ओडिशा), जो उसके जीवन में महत्वजपूर्ण बदलाव लाने वाली साबित हुई। कलिंग युद्ध में भयानक नरसंहार व विनाश हुआ। युद्ध भूमि के कष्टों व अत्यानचारों ने अशोक के हृदय को विदीर्ण कर दिया। उसने भविष्य। में और कोई युद्ध न करने का प्रण कर लिया। उसने सांसरिक विजय के अत्यािचारों तथा सदाचार व आध्याुत्मिकता की सफलता को समझा। वह बुद्ध के उपदेशों के प्रति आकर्षित हुआ तथा उसने अपने जीवन को, मनुष्यफ के हृदय को कर्तव्यउ परायणता व धर्म परायणता से जीतने में लगा दिया।

मौर्य साम्राज्यष का अंत

अशोक के उत्त राधिकारी कमज़ोर शासक हुए, जिससे प्रान्तोंई को अपनी स्वsतंत्रता का दावा करने का साहस हुआ। इतने बड़े साम्राज्या का प्रशासन चलाने के कठिन कार्य का संपादन कमज़ोर शासकों द्वारा नहीं हो सका। उत्त।राधिकारियों के बीच आपसी लड़ाइयों ने भी मौर्य साम्राज्यज के अवनति में योगदान किया।

ईसवी सन् की प्रथम शताब्दि के प्रारम्भ में कुशाणों ने भारत के उत्तचर पश्चिम मोर्चे में अपना साम्राज्यक स्‍‍थापित किया। कुशाण सम्राटों में सबसे अधिक प्रसिद्ध सम्राट कनिष्के (125 ई. से 162 ई. तक), जो कि कुशाण साम्राज्या का तीसरा सम्राट था। कुशाण शासन ईस्वीा की तीसरी शताब्दि के मध्यर तक चला। इस साम्राज्यम की सबसे महत्वसपूर्ण उपलब्धियाँ कला के गांधार घराने का विकास व बुद्ध मत का आगे एशिया के सुदूर क्षेत्रों में विस्ताहर करना रही।

गुप्तग साम्राज्यक

कुशाणों के बाद गुप्त साम्राज्यल अति महत्वापूर्ण साम्राज्यय था। गुप्त अवधि को भारतीय इतिहास का स्वnर्णिम युग कहा जाता है। गुप्तर साम्राज्यल का पहहला प्रसिद्ध सम्राट घटोत्कोच का पुत्र चन्द्र गुप्तु था। उसने कुमार देवी से विवा‍ह किया जो कि लिच्छिवियों के प्रमुख की पुत्री थी। चन्द्र गुप्त‍ के जीवन में यह विवाह परिवर्तन लाने वाला था। उसे लिच्छिवियों से पाटलीपुत्र दहेज में प्राप्तव हुआ। पाटलीपुत्र से उसने अपने साम्राज्य= की आधार शिला रखी व लिच्छिवियों की मदद से बहुत से पड़ोसी राज्योंर को जीतना शुरू कर दिया। उसने मगध (बिहार), प्रयाग व साकेत (पूर्वी उत्तवर प्रदेश) पर शासन किया। उसका साम्राज्यो गंगा नदी से इलाहाबाद तक फैला हुआ था। चन्द्र गुप्त को महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित किया गया था और उसने लगभग पन्द्र ह वर्ष तक शासन किया।

चन्द्रागुप्ति का उत्त राधिकारी 330 ई0 में समुन्द्र गुप्त हुआ जिसने लगभग 50 वर्ष तक शासन किया। वह बहुत प्रतिभा सम्पिन्न योद्धा था और बताया जाता है कि उसने पूरे दक्षिण में सैन्या अभियान का नेतृत्व किया तथा विन्य्उत् क्षेत्र के बनवासी कबीलों को परास्त किया।

समुन्द्र गुप्तe का उत्तsराधिकारी चन्द्र गुप्त2 हुआ, जिसे विक्रमादित्यp के नाम से भी जाना जाता है। उसने मालवा, गुजरात व काठियावाड़ के बड़े भूभागों पर विजय प्राप्तग की। इससे उन्हे् असाधारण धन प्राप्त हुआ और इससे गुप्तु राज्यव की समृद्धि में वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान गुप्ते राजाओं ने पश्चिमी देशों के साथ समुद्री व्या पार प्रारम्भ किया। बहुत संभव है कि उसके शासनकाल में संस्कृंत के महानतम कवि व नाटककार कालीदास व बहुत से दूसरे वैज्ञानिक व विद्वान फले-फूले।

गुप्तन शासन की अवनति

ईसा की 5वीं शताब्दि के अन्ते व छठवीं शताब्दि में उत्ततरी भारत में गुप्तy शासन की अवनति से बहुत छोटे स्वईतंत्र राज्योंा में वृद्धि हुई व विदेशी हूणों के आक्रमणों को भी आकर्षित किया। हूणों का नेता तोरामोरा था। वह गुप्ती साम्राज्यब के बड़े हिस्सोंव को हड़पने में सफल रहा। उसका पुत्र मिहिराकुल बहुत निर्दय व बर्बर तथा सबसे बुरा ज्ञात तानाशाह था। दो स्थािनीय शक्तिशाली राजकुमारों मालवा के यशोधर्मन और मगध के बालादित्यस ने उसकी शक्ति को कुचला तथा भारत में उसके साम्राज्यक को समाप्ते किया।

हर्षवर्धन

7वीं सदी के प्रारम्भे होने पर, हर्षवर्धन (606-647 इसवी में) ने अपने भाई राज्यyवर्धन की मृत्युn होने पर थानेश्वीर व कन्नौpज की राजगद्दी संभाली। 612 इसवी तक उत्त-र में अपना साम्राज्यर सुदृढ़ कर लिया।

620 इसवी में हर्षवर्धन ने दक्षिण में चालुक्य् साम्राज्य>, जिस पर उस समय पुलकेसन द्वितीय का शासन था, पर आक्रमण कर दिया परन्तु चालुक्यस

सम्राट हर्षवर्धन History[/caption]

ने बहुत जबरदस्त/ प्रतिरोध किया तथा हर्षवर्धन की हार हो गई। हर्षवर्धन की धार्मिक सहष्णु ता, प्रशासनिक दक्षता व राजनयिक संबंध बनाने की योग्यषता जगजाहिर है। उसने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्था पित किए व अपने राजदूत वहां भेजे, जिन्होनने चीनी राजाओं के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया तथा एक दूसरे के संबंध में अपनी जानकारी का विकास किया।

चीनी यात्री ह्वेनसांग, जो उसके शासनकाल में भारत आया था ने, हर्षवर्धन के शासन के समय सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक स्थितियों का सजीव वर्णन किया है व हर्षवर्धन की प्रशंसा की है। हर्षवर्धन की मृत्युं के बाद भारत एक बार फिर केंद्रीय सर्वोच्चै शक्ति से वंचित हो गया।

बादामी के चालुक्यु

6ठवीं और 8ठवीं इसवी के दौरान दक्षिण भारत में चालुक्यध बड़े शक्तिशाली थे। इस साम्राज्यi का प्रथम शासकि पुलकेसन, 540 इसवी मे शासनारूढ़ हुआ और कई शानदार विजय हासिल कर उसने शक्तिशाली साम्राज्यी की स्थावपना किया। उसके पुत्रों कीर्तिवर्मन व मंगलेसा ने कोंकण के मौर्यन सहित अपने पड़ोसियों के साथ कई युद्ध करके सफलताएं अर्जित की व अपने राज्य का और विस्तातर किया।

कीर्तिवर्मन का पुत्र पुलकेसन द्वितीय, चालुक्यई साम्राज्य के महान शासकों में से एक था, उसने लगभग 34 वर्षों तक राज्यन किया। अपने लम्बेय शासनकाल में उसने महाराष्ट्रह में अपनी स्थिति सुदृढ़ की व दक्षिण के बड़े भूभाग को जीत लिया, उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि हर्षवर्धन के विरूद्ध रक्षात्मटक युद्ध लड़ना थी।

तथापि 642 इसवी में पल्ल व राजा ने पुलकेसन को परास्तन कर मार डाला। उसका पुत्र विक्रमादित्य , जो कि अपने पिता के समान महान शासक था, गद्दी पर बैठा। उसने दक्षिण के अपने शत्रुओं के विरूद्ध पुन: संघर्ष प्रारंभ किया। उसने चालुक्योंठ के पुराने वैभव को काफी हद तक पुन: प्राप्तत किया। यहां तक कि उसका परपोता विक्रमादित्यक द्वितीय भी महान योद्धा था। 753 इसवी में विक्रमादित्य् व उसके पुत्र का दंती दुर्गा नाम के एक सरदार ने तख्ताद पलट दिया। उसने महाराष्ट्र व कर्नाटक में एक और महान साम्राज्यु की स्थारपना की जो राष्ट्रद कूट कहलाया।

कांची के पल्लरव

छठवीं सदी की अंतिम चौथाई में पल्लहव राजा सिंहविष्णुम शक्तिशाली हुआ तथा कृष्णाक व कावेरी नदियों के बीच के क्षेत्र को जीत लिया। उसका पुत्र व उत्त राधिकारी महेन्द्र वर्मन प्रतिभाशाली व्योक्ति था, जो दुर्भाग्यक से चालुक्य‍ राजा पुलकेसन द्वितीय के हाथों परास्त् होकर अपने राज्यव के उत्तवरी भाग को खो बैठा। परन्तु उसके पुत्र नरसिंह वर्मन प्रथम ने चालुक्ये शक्ति का दमन किया। पल्लउव राज्यभ नरसिंह वर्मन द्वितीय के शासनकाल में अपने चरमोत्कथर्ष पर पहुंचा। वह अपनी स्थािपत्य् कला की उपलब्धियों के लिए प्रसिद्ध था, उसने बहुत से मन्दिरों का निर्माण करवाया तथा उसके समय में कला व साहित्य फला-फूला। संस्कृथत का महान विद्वान दानदिन उस के राजदरबार में था। तथापि उसकी मृत्युी के बाद पल्ललव साम्राज्यक की अवनति होती गई। समय के साथ-साथ यह मात्र स्थामनीय कबीले की शक्ति के रूप में रह गया। आखिरकार चोल राजा ने 9वीं इसवी. के समापन के आस-पास पल्ल व राजा अपराजित को परास्ता कर उसका साम्राज्यक हथिया लिया।

भारत के प्राचीन इतिहास ने, कई साम्राज्योंन, जिन्होंरने अपनी ऐसी बपौती पीछे छोड़ी है, जो भारत के स्वतर्णिम इतिहास में अभी भी गूंज रही है, का उत्था न व पतन देखा है। 9वीं इसवी. के समाप्तो होते-होते भारत का मध्यमकालीन इतिहास पाला, सेना, प्रतिहार और राष्ट्रह कूट आदि – आदि उत्थारन से प्रारंभ होता है।

:: संदर्भ सूची ::

1. “सरस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता”. इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी). अभिगमन तिथि १५ जनवरी २००९.
2. सभ्यता, हड़प्पा. “हड़प्पा सभ्यता”. https://www.digiblog.co.in/harappa-civilization/.
3. मीर्चा ईटु, दर्शन और धर्म का इतिहास, बुखारेस्ट, कल की रोमानिया का प्रकाशन संस्था (ISBN 973-582-971-1)
4. Ananda K Coomaraswamy, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म, नई यॉर्क, गोल्डन एलिक्सिर प्रेस, (ISBN 978-0-9843082-3-1)
5. http://www.asiantribune.com/node/85770 विश्व में बौद्ध धर्म
6. डॉ. रवीन्द्र कुमार. भारत में दलित वर्ग और दलितोद्धार आंदोलन (१९०० ई. – १९५० ई. )
7. Vijay Nahar (2013). Shiladitya Samrat Harshvardhan Evem Unka Yug. Aavishkar Publishers

Mr. Pratapsinh Rajput
(M.A., M.Phil, With History)
PhD Pursing – H.N.G.Uni., Patan

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